सुकून की तलाश में
भटक रहे इधर उधर
जानते कुछ भी नहीं
मानने की बस फिकर
किसी को है पैसा बना
कोई कहता है घर हो बड़ा
बुद्ध का था घर बड़ा
दौलत भी था बेइन्तहा
फिर क्यों जिया फ़क़ीर सा
है कोई जवाब क्या
सोहरतो को भी देखा है
घर के है ना घाट के
जी रहे उचाट से
बोलते हो झूठ क्यों
जब नही कुछ भी पता
धड़कनो में वो बसा
उसको ढूढ़ते कँहा
नजर जरा घुमाओ तो
जिसकी तलाश है सदा
तुम्हारे दिल मे वो बसा
उसको कहो खुदा
या सुकून नाम दो
उसको नही जो पाओगे
ऐसे भटकते जाओगे
भटक रहे इधर उधर
जानते कुछ भी नहीं
मानने की बस फिकर
किसी को है पैसा बना
कोई कहता है घर हो बड़ा
बुद्ध का था घर बड़ा
दौलत भी था बेइन्तहा
फिर क्यों जिया फ़क़ीर सा
है कोई जवाब क्या
सोहरतो को भी देखा है
घर के है ना घाट के
जी रहे उचाट से
बोलते हो झूठ क्यों
जब नही कुछ भी पता
धड़कनो में वो बसा
उसको ढूढ़ते कँहा
नजर जरा घुमाओ तो
जिसकी तलाश है सदा
तुम्हारे दिल मे वो बसा
उसको कहो खुदा
या सुकून नाम दो
उसको नही जो पाओगे
ऐसे भटकते जाओगे
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें