कहते है जीवन
पर जीत हुआ तो कोई नज़र ही नही आता
यंहा तो बस हर कोई मर रहा है हर रोज
देखा जाय तो मृत्यु कोई घटना नही जो एक दिन घटती है
पर एक प्रकिया है जो 60 साल 70 साल या 75 साल में पूरी हो जाती है और जीवन अधूरा का अधूरा ही रह जाता है।
सारी उम्र जीने की तैयारी में ही निकल जाता है और जीना कभी हो ही नही पाता ।
जीना टलता ही चला जाता है कभी डिग्री के पीछे तो कभी नौकरी के बाद और कभी जिम्मेदारियों को पूरा करने की जिम्मेदारी
बस पता ही नही चलता कि कब समय हाथ से निकल गया और पीछे रह जाती है अधूरी ख्वाहिशें, पछतावा, ग्लानि ,गुस्सा कभी खुद से कभी दूसरों से
और अंत मे एक दिन बचता है बस राख का ढेर
पर जीत हुआ तो कोई नज़र ही नही आता
यंहा तो बस हर कोई मर रहा है हर रोज
देखा जाय तो मृत्यु कोई घटना नही जो एक दिन घटती है
पर एक प्रकिया है जो 60 साल 70 साल या 75 साल में पूरी हो जाती है और जीवन अधूरा का अधूरा ही रह जाता है।
सारी उम्र जीने की तैयारी में ही निकल जाता है और जीना कभी हो ही नही पाता ।
जीना टलता ही चला जाता है कभी डिग्री के पीछे तो कभी नौकरी के बाद और कभी जिम्मेदारियों को पूरा करने की जिम्मेदारी
बस पता ही नही चलता कि कब समय हाथ से निकल गया और पीछे रह जाती है अधूरी ख्वाहिशें, पछतावा, ग्लानि ,गुस्सा कभी खुद से कभी दूसरों से
और अंत मे एक दिन बचता है बस राख का ढेर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें