बुधवार, 25 मार्च 2020

खामोश अफसाना

मजबूरी रही होगी शायद
कोई ऐसे नही जाता
फिर वक्त का भी तो ऐसा है
के वो लौट कर नही आता
आती हैं तो बस यादें
वो खट्टी मीठी सारी बातें
हँसाती हैं कभी तो वो
कभी रुलाती हैं
यही इक अहसास
दिलाती है
गुजरे हुए लम्हें कँहा
लौट कर आते है
टूट गए शाक से जो पत्ते
फिर कँहा शाक पर आते है
वो दूर कंही हवाओं में बिखर जाते है




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