शुक्रवार, 19 मार्च 2021

सामुहिक जिम्मेदारी

 आज इन्सान कितना लालची लोभी हो गया है।  छोटी-छोटी बात पर लोग लड़ना झगड़ना शुरू कर देते हैं।  ईर्ष्या, स्वार्थ सिद्धि ,एक दूसरे को नीचा दिखाना ,दूसरों के धोखा देना ,झूठ बोलना इतनी आम बात हो गयी है कि अब हमे ये बातें परेशान नही करती है ।हम सब इन चीज़ो के आदी हो गए हैं ।

इंसानियत, दया ,सहानभूति ,अपनापन धर्म और त्याग कही खो गया है। आज कोई अच्छा होता भी है तो लोग उन्हें पागल समझते है और बस उसका इस्तेमाल इतनी बुरी तरह से करते हैं कि वो बेचारा भी कसम खा लेता है अपनी इंसानियत को घर मे छोड़ कर तब ही बाहर निकलेगा ।

सब अपने काम में व्यस्त हैं किसी के पास दो मिनट का समय नही है कि बैठ के इसके बारे में सोचे पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि समाज में क्या हो रहा है 

 सब खुश है नयी टेक्नोलॉजी, नई चीजों की खोज हो रहीं है । ज़िन्दगी दिन पर दिन और आरामदायक होती जा रही है 

पर जरा ध्यान दीजिये सबसे ज्यादा अविष्कार defence के क्षेत्र में हो रहा है रोज नये नये विनाशकारी equipment बन रहे है जिनमे पूरे विश्व को खत्म करने की क्षमता है 

ऐसा नही है कि अच्छी चीज़ों का विकास नही हो रहा पर जब उन्हें उपयोग में लाने वाला ही बुरा है तो उसका अच्छा परिणाम कँहा से आएगा 

विकास के नाम पर हमने विनास की सारा समान तैयार कर लिया है आज पूरा विश्व तीसरे विश्व युद्ध की ओर तेजी से बढ़ रहा है। सब एक दूसरे से लड़ रहे है या अपने मे ही लड़ रहे हैं

ऐसा कोई देश नही है जिसका किसी के साथ कोई विवाद न हो पर ये सब हमारे लिए बस समाचार होता है हम मनोरंजन के लिए tv पर ये सब देखते है पर समझते नही है कि ये मनोरंजन नहीं मौत कितनी करीब आ रही है उसकी आहट है। 

आखिर हम कब सोचेंगे कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं वो हमारे लिए ठीक है या नही? हम कब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे कि इस संसार को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारों की नही हम सब की है |

 



रविवार, 10 मई 2020

सुकून की तलाश

सुकून की तलाश में
भटक रहे इधर उधर
जानते कुछ भी नहीं
मानने की बस  फिकर
किसी को है पैसा बना
कोई कहता है घर हो बड़ा
बुद्ध का था घर बड़ा
 दौलत भी था बेइन्तहा
फिर क्यों जिया फ़क़ीर सा
है कोई जवाब क्या
सोहरतो को भी देखा है
घर के है ना घाट के
जी रहे उचाट से
बोलते हो झूठ क्यों
जब नही कुछ भी पता
धड़कनो में वो बसा
उसको ढूढ़ते कँहा
नजर जरा घुमाओ तो
जिसकी तलाश है सदा
तुम्हारे दिल मे वो बसा
उसको कहो खुदा
या सुकून नाम दो
उसको नही जो पाओगे
ऐसे भटकते जाओगे

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

मैं ऐसी ही हूँ

क्यों अक्सर ऐसा लगता है मुझको
मैं जो कर रही हूं वो क्यों कर रही हूं
बड़ा अनजाना लगता है सब कुछ यँहा पर
किस ओर मैं ये सफर कर रही हूं
क्या मैं सही को गलत कर रही हु
या मैं गलत से उलट कर रही हूं
या छोड़ सब गलत और सही को
जो दिल में है
बस सबको नजर कर रही हूं
कुछ गुस्सा है और कुछ गम है शायद
कुछ अपने गैर हुए जा रहे हैं
और कुछ गैरों को अपना रही हु
नही कोई कहने को अपना यँहा पर
मैं हर दर्द को एक नगमा बना रही हूं
खुश हूं दुखी हूं जो कुछ भी हु मै
खुद को बस वैसे ही अपना रही हूं

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

कभी खुशी कभी गम

कभी खुशी तो कभी टूटा हुआ ख्वाब है जिंदगी
कांटो में उलझा एक गुलाब है जिंदगी

तमाम कोशिशों के बावजूद
जो किसी के ना समझ मे आये
बस एक ऐसा ही किताब है जिंदगी

कँहा कोई ऊबर पता है इसके नशे से
कुछ ऐसा मदहोश करने वाला शराब है ज़िन्दगी

सारी जद्दोजहद है जीने की यँहा
और फिर भी लोग कहते है खराब है जिंदगी

रविवार, 5 अप्रैल 2020

अजनबी सी ज़िन्दगी

बड़ी अजीब सी है ज़िन्दगी
हर कदम पर साथ
पर फिर भी लगती है बड़ी अजनबी
यूं तो कुछ भी नही है मसअले
फिर भी ये कभी सुलझती नहीं
उलझी हुई है इस क़दर
कि सब सही और कुछ भी नही
अनबन सी है कुछ इस तरह
ना मैं उसे समझ सकी
न वो मुझे समझ सकी

मंगलवार, 31 मार्च 2020

कुछ यादें कभी पुरानी नहीं होतीं

कुछ यादें, कुछ बातें
कभी पुरानी नही होती
कुछ अहसास, कुछ मुलाकातें
कभी पुरानी नहीं होतीं

कुछ लम्हें गुजर भी गुजरा नही करतें
क्योंकि उनकी कशिश
कभी पुरानी नहीं होतीं

निकल जाती है उम्र
यूं ही पलक झपकते
पर कुछ लम्हों को
जीने की ख्वाहिश
कभी पुरानी नहीं होतीं

हा, वक़्त की धूल से
धुंधला जाता है सबकुछ
पर दिल के किसी कोने में इक तस्वीर
कभी पुरानी नहीं होती

सोमवार, 30 मार्च 2020

खुद में खुद की तलाश

कुछ खुशी की बात कर
कुछ ज़िन्दगी की बात कर

क्या ढूँढता है बेवजह
कभी खुद की भी तो तलाश कर

खुद में ही खुदा का नूर है
कभी इसका भी एहसास कर

कब तक खुद को सताएगा
कब तक भटकता जायेगा
मंजिल तो तेरे पास है
क्या तुझको इसका एहसास है

खुद को खुदी में खोज ले
तेरे खुशी को भी तेरी तलाश है